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मंगलवार, 2 दिसंबर 2014

साल 2015 में दो बार मनेगा ईद-ए-मिलादुन्नबी

योम-ए-पैदाइश : पहला 4 या 5 जनवरी और दूसरी बार 24 या 25 दिसंबर (दोनों चांद हिसाब से) को, 33 से 34 साल में रिपीट होता है इस्लामी कलेंडेर।
साल 2015 में पैगंबर हजरत मोहम्मद साहब की योम-ए-पैदाइश का दिन ईद-ए-मिलादुन्नबी (बारावफात) दो बार मनेगा।  मोहम्मद साहब की पैदाइश के पर्व को अकीदतमंद दोहरी खुशियों के साथ मनाएंगे। इस्लामी कलेंडेर 33 से 34 साल में रिपीट होने के कारण ऐसा संयोग बनेगा।
 इस्लामी कलेंडेर चांद के हिसाब से चलने के कारण इस बार इस्लामी माह रवि-उल-अव्वल की 12 तारीख यानि ईद मिलादुन्नबी 4 या 5 जनवरी 2015 (चांद के हिसाब से) को होगी। इसी तरह दिसंबर 2015 में रवि-उल-अव्वल की 12 तारीख ( ईद-ए-मिलादुन्नबी) 24 या 25 दिसंबर 2015 (चांद के हिसाब से) को होगी। इस तरह मोहम्मद साहब की पैदाइश का दिन साल 2015 में दो बार मनेगा।
 इस्लामी माह रवि-उल-अव्वल में मनता है ईद-मिलादुन्नबी
 इस्लामी कलेंडेर के तीसरे माह रवि-उल-अव्वल की 12 तारीख को ईद-ए-मिलादुन्नबी (बारावफात) मनाई जाती है। यौम-ए-पैदाइश के इस पर्व पर सीरते पाक के जलसे आयोजित होते हैं। कुराने पाक की तिलावत और नाते पाक व तकरीरें की जाती हैं। मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्रों में मस्जिदों, मदरसों और अन्य स्थानों पर विशेष आयोजन होते हैं। अकीदतमंद इबादत में समय बिताएंगे। कब्रिस्तान में जाकर दुरुद सलाम पढ़े जाएंगे और फातेहा ख्वानी होगी।
 मोहम्मद साहब की हिजरत के 1435 वर्ष पूरे
 मोहम्मद साहब मक्के से मदीना आए, तो उसे हिजरत कहा जाता है। वह साल हिजरी कहलाया। जामिया आलिया के निदेशक हाजी अनवर शाह बताते हैं कि मोहम्मद साहब की हिजरत को अब 1435 वर्ष हो गए।  इस्लाम में लगभग सवा लाख पैगंबर हुए। इनमें पहले पैगंबर आदम अल इस्लाम हुए, जबकि आखिरी और सबसे बड़े पैगंबर हजरत मोहम्मद साहब हुए। इस्लामी माह के तीसरे महीने की 12 तारीख को मोहम्मद साहब का जन्म माना जाता है। चूंकि इस्लामी कलेंडेर चांद हिसाब से चलता है।
 हर साल 11 से 12 दिन पीछे हो जाता है इस्लामी कलेंडेर
 इस्लामी कलेंडेर में प्रत्येक माह 29 या 30 दिन का होता है, फिर चांद के हिसाब से अगले माह की शुरुआत होती है। अंग्रेजी कलेंडेर में जहां 365 दिन होते हैं, वहीं इस्लामी कलेंडेर में 360 दिन होते हैं। इसके अलावा हर साल इस्लामी कलेंडेर में  अंग्रेजी कलेंडेर के मुकाबले 11-12 दिन का अंतर आ जाता है। इस तरह हर बार 33 से 34 साल में इस्लामी कलेंडेर रिपीट हो जाता है। इस कारण हर ऋतु में इस्लामी पर्व मनता है। इसी करण 33 से 34 साल में एक पर्व दो बार भी आ जाता है।

शनिवार, 10 सितंबर 2011

हाइटैक हुआ पितरों के निमित्त तर्पण



प्रवासी भारतीय इंटरनेट के जरिए शहर के पंडितों से करा रहे हैं तर्पण
अब पितृों के लिए तर्पण की विधि भी हाइटेक हो गई है। प्रवासी भारतीय इंटरनेट के माध्यम से शहर के पंडितों के दिशा-निर्देशों पर वहां पर पितृों के निमित्त तर्पण कर रहे हैं।
इन लोगों का मानना है कि देश से दूर रहकर भी वह संस्कार को आसानी से दिलोदिमाग से नहीं निकाल सकते। यहां की मर्यादाएं आज भी हमें अपने कर्तव्यों का निर्वाह करने की याद दिलाती है।
यूं करते हैं पितृ तर्पण
निश्चित तिथि पर थाली में संकल्प स्वरूप पकवान आदि रखकर और अक्षत, पुष्प व चंदन से वेब कैमरे के माध्यम से पंडितों के निर्देशानुसार पितरों के लिए श्राद्ध, तर्पण व दान आदि करते हैं। भारतीय समय व विदेशी समय के बीच तालमेल बैठाकर जयपुर के पंडित इंटरनेट के माध्यम से तर्पण करवाते हैं।
संस्कृति के प्रति लगाव बढ़ा घ् गुरुकुल वेदाश्रम के संस्थापक मनोहर चतुर्वेदी के अनुसार विदेशों में रहने वाले भारतीयों में अपनी संस्कृति और पूर्वजों के प्रति श्रद्धाभाव बढ़ा है। भारतीय समयानुसार लंदन में उद्योगपति ध्रुवसिंह ने शाम को तर्पण करवाया था।
समय का अभाव, इंटरनेट का रुझान - पंडित पुरुषोत्तम गौड़ के अनुसार वर्तमान में समय की कमी और इंटरनेट के प्रति बढ़ते रुझान ने भी पितृ तर्पण की विधि को हाइटेक बना दिया है। इन दिनों विदेशों में रहने वाले कई प्रवासी भारतीय पितृ तर्पण करा रहे हैं। अब तक चार प्रवासी भारतीयों का इंटरनेट के माध्यम से तर्पण करवा चुका हूं।
केस-1
पितृों को तर्पण करना जरूरी है। श्राद्ध पक्ष के अलावा दीपावली पर भी ऑनलाइन पूजा पाठ कराते हैं-ध्रुव सिंह तौमर, लंदन।
केस-2
यहां समय का अभाव और पंडित नहीं मिलने से ऑनलाइन पितृ पक्ष के दौरान पूजा करानी पड़ी। -एस.एन.गुप्ता, अमेरिका।
केस-3
अपनी मर्यादा को बनाए रखने तथा पितृों को याद करते हुए उनके लिए तर्पण करना बहुत जरूरी है।-विजया शर्मा, लंदन।
केस-4
यह पक्ष पूर्णिमा से अमावस्या तक ही आता है। इस दौरान शुभ कार्य बाधित होते हैं और पितृों का आशीर्वाद जरूरी होता है-सिया देवी, सिंगापुर।

शनिवार, 11 सितंबर 2010

गणपति चतुथी : ईद-उल-फितर-33वर्ष बाद एक साथ



बाराने रहमत के साथ नमाजियों का इस्तकबाल
भोर होते ही पक्षियों की चहचहाहट के साथ रिमझिम बारिश की बूंदों का आगमन। प्रथम पूज्य गणेश के दर्शनों के लिए भक्तों की कतार और श्रद्धा का अटूट नजारा। वहीं दूसरी ओर ईद—उल—फितर के पावन पर्व पर अकीदतमंदों बारगाह-ए-यजदी में सजदा। गणपति के मंत्रों की अविरल धारा और ईद के पावन मौके पर खुदा की बारगाह में अकीदतमंदों के सजदे के बीच मानो इंद्रदेव भी उनके अभिवादन में उमड़ पड़े। ईद और गणेश चतुर्थी का पर्व 33वर्ष बाद एक साथ आया। अब यह पावन मौका 99 साल बाद आएगा।
प्रणम्ये शीर्षादेवं गौरीपुत्र विनायकं....
गणेश चतुर्थी पर मानो पूरा शहर प्रथम पूज्य की अगवानी में डूब गया हो। शहर के प्रमुख गणेश मंदिरों के अलावा घर—घर में सुबह से ही गौरीपुत्र की महिमा का गान शुरू हो गया।
मोतीडूंगरी गणेशजी मनोहारी पोशाक में नजर आए। वहीं भगवान गणेश स्वर्णमंडित मुकुट और चांदी की धोती में आकर्षक मुद्रा में नजर आ रहे थे। इस अवसर पर मोतीडूंगरी गणेश मंदिर में महंत कैलाश शर्मा के सान्निध्य में विभिन्न झांकियों में मनोहारी पोशाकों के साथ आरती की गई। इसके अतिरिक्त गणेश चतुर्थी पर गढ़ गणेश मंदिर, लाल डूंगरी गणेश मंदिर, नहर के गणेश मंदिर, सिद्धि विनायक मंदिर, दिल्ली रोड के बंगाली बाबा आत्माराम ब्रह्मचारी गणेश मंदिर सहित शहरभर के मंदिरों में विभिन्न आयोजन हुए। इस दौरान मंदिरों में मेले का सा माहौल रहा।
मोतीडूंगरी गणेश मंदिर में तड़के से ही भक्तों की लाइन लगी रही। प्रथम पूज्य की एक झलक देखने के लिए भक्त उत्साह के साथ आगे बढ़ते ही जा रहे थे। बारिश के कारण दोपहर 12 बजे तक भक्तों की संख्या बहुत कम थी। वहीं दोपहर बाद 2 बजे से पासधारकों की लाइन भी लंबी नजर आई। इस बीच तख्तेशाही रोड तक भक्तों की लंबी कतार दिखाई दी।
अल्लाह के बादगाने में ईद का शुक्राना
ईद-उल-फितर के पावन पर्व पर दिल्ली रोड स्थित ईदगाह में बड़ी संख्या में अकीदतमंदों ने नमाज अदा की व खुदा से देश में खुशहाली की दुआ मांगी। इस बीच बाराने रहमत के साथ नमाजियों का इस्तकबाल हुआ।
मुख्य नमाज के लिए ईदगाह में सुबह से ही लोगों के पहुंचने का सिलसिला शुरू हो गया था। हर कोई आगे की पंक्ति में बैठने के लिए उत्सुक था। सुबह फजर की नमाज के बाद ही घरों में ईद की नमाज की तैयारियां शुरू हो गई थी। युवा, बड़े और यहां तक कि छोटे बच्चे भी नमाज के लिए ईदगाह पहुंचे। सुबह आठ बजते ही रामगंज, घाटगेट, चार दरवाजा, आगरा रोड तथा गलता गेट के रास्तों में नमाजियों का रैला था। ऐसा लग रहा था कि पूरा शहर ही ईदगाह की ओर चल दिया हो।
चीफ काजी खालिद उस्मानी ने खुतबा दिया व नमाज अदा करवाई। चीफ काजी ने कहा कि गणपति चतुर्थी व ईद का एक साथ होना ईश्वर का संदेश है। वह बताना चाहता है कि हिंदू-मुस्लिम एक ही पंथ हैं यह किसी सीमा में बंधे हुए नहीं है। देश दुनिया में इसीलिए भारत की पहचान है कि हिंदू-मुस्लिम आपसी भाईचारे से सभी पर्व मनाते हैं। शहर मुफ्ती अहमद हसन फितरे की अहमियत पर प्रकाश डाला। मौलवी महफूज नासिर व मोहम्मद जाकिर ने तकरीर पेश की।
दूसरी ओर जौहरी बाजार स्थित जामा मस्जिद में इमाम मुफ्ती अमजद अली ने नमाज अदा करवाई। उन्होंने कहा कि ईद का त्योहार अल्लाह की बादगाने में शुक्राने के तौर पर है। इस मौके पर जामा मस्जिद इंतजामिया कमेटी के सचिव अनवर शाह ने मुल्क की तरक्की की दुआ मांगी। आमेर रोड पर शिया जामा मस्जिद में मौलाना सैयद नाजिश अकबर काजमी साहब ने नमाज अदा करवाई। नमाज के बाद नमाजियों ने गिले-शिकवे दूर कर एक दूसरे से गले मिलकर ईद की बधाई दी।

शनिवार, 28 अगस्त 2010

जन्माष्टमी उत्सव पर असमंजस!


जन्माष्टमी को लेकर इस बार असमंजस की स्थिति बनी हुई है। पंचांगों के मुताबिक जन्माष्टमी का पर्व 1 सितंबर को मनाया जाएगा, जबकि गौडिय़ संप्रदाय के मुताबिक जयपुर के आराध्य गोविंददेवजी मंदिर में यह उत्सव 2 सितंबर को मनाया जाएगा।
शास्त्रों के मुताबिक भगवान कृष्ण का जन्म अष्टमी, रोहणी नक्षत्र व अद्र्धरात्रि में हुआ था। इसे देखते हुए पंचांगों के मतानुसार जन्माष्टमी का पर्व 1 सितंबर को मनाया जाएगा। मगर गोविंददेवजी मंदिर में जन्माष्टमी का यह पर्व 2 सितंबर का मनाए जाने और पंचांगों के मत अलग-अलग होने से जन्माष्टमी पर्व मनाने को लेकर असमंजस रहेगा। हालांकि कृष्ण की नगरी मथुरा व वृंदावन में भी यह पर्व 2 को ही मनाया जाना है। मगर तिथियों की स्थिति कृष्ण जन्म के उत्सव की घड़ी को मनाए जाने पर सवाल खड़ कर रही है?
पं.बंशीधर जयपुर पंचांग निर्माता पं.दामोदर प्रसाद शर्मा के मुताबिक हर साल उदियात तिथि के आधार पर गोविंद देवजी में रोहणी युक्त अद्र्धव्यापिनी अष्टमी तिथि में जन्माष्टमी पर्व मनाया जाता है। लेकिन इस बार 2 सितंबर को अद्र्धरात्रि में नवमी तिथि रहेगी व मृगशिरा नक्षत्र रहेगा। इसलिए 1 सितंबर को जन्माष्टमी पर्व मनाना ही श्रेष्ठ रहेगा।
राजस्थान ज्योतिष परिषद के महासचिव डॉ. विनोद शास्त्री के अनुसार जन्माष्टमी का पर्व तो अद्र्धव्यापिनी तिथि में रोहिणी नक्षत्र और अष्टमी में ही मनाया जाना चाहिए। ज्योतिषी दिनेश मिश्रा ने बताया कि भगवान कृष्ण की जन्म की तिथि के अनुसार अद्र्धरात्रि में रोहणी नक्षत्र होने पर ही मनाया जाना श्रेष्ठ माना गया है।
पंचांगों मे ये है तिथि का फेर
सप्तमी तिथि 1 सितंबर को सुबह 10.51 तक रहेगी। इसके बाद अष्टमी तिथि शुरू होगी, जो 2 सितंबर को सुबह10.43 तक रहेगी। इसके बाद नवमी तिथि शुरू हो जाएगी। वहीं रोहिणी नक्षत्र 1 सितंबर को दोपहर 1.19 से शुरू होगा, जो 2 सितंबर को दोपहर 1.47 बजे तक रहेगा। इसके बाद मृगशिरा नक्षत्र शुरू हो जाएगा।

शनिवार, 21 अगस्त 2010

वरिष्ठ भाजपा नेता सीपी ठाकुर पहुंचे जयपुर के ज्योतिषविद की शरण में


ज्योतिषाचार्य पं.पुरुषोत्तम गौड से जाना चुनावी चिंता का हल, वरिष्ठ भाजपा नेता ठाकुर ने कहा किभाजपा-संघ का आपसी तालमेल न होना बना राजस्थान में हार का कारण
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वरिष्ठ भाजपा नेता व बिहार प्रदेशाध्यक्ष चंद्रेश्वर प्रसाद ठाकुर पिछले दिनों गोपनीय यात्रा पर पटना से जयपुर ज्योतिषविद की शरण में पहुंचे। आगामी माह में होने वाले चुनावों की चिंता को दूर करने के लिए वह पटना से यहां स्वेजफार्म निवासी ज्योतिषाचार्य पं.पुरुषोत्तम गौड़ से मंत्रदीक्षा व हाल-ए-चुनाव की जानकारी प्राप्त पहुंचे। सी.पी.ठाकुर ने करीब एक घंटे तक गुप्त मंत्रणा की। इसके बाद वह यहां से दिल्ली के लिए रवाना हो गए। इस के दौरान सी.पी.ठाकुर की विशेष बातचीत के अंश-
--प्रदेश में भाजपा की हार का कारण क्या रहा?
--यूं तो वसुंधरा बहुत अच्छी मुख्यमंत्री साबित हुई हैं मगर संघ और भाजपा का आपसी तालमेल नही बैठ पाने के कारण भाजपा को प्रदेश में हार का सामना करना पड़ा। हालांकि उस समय मैंने राजस्थान का प्रभारी बनाने का प्रस्ताव भी रखा था, मगर कुछ कारणों से इस पर सहमति नहीं हो पाई।
--मुख्यमंत्री के रूप में उनका कार्यकाल कैसा रहा?
--सर्वश्रेष्ठ। जयपुर बम धमाके के दौरान हर पीढि़त के उनकी तत्परता व उनका कार्य सराहनीय रहा।
--राजस्थान की हार से अब बिहार में चुनावी रणनीति के लिए आपने क्या सबक लिया?
--बिहार में संघ के साथ तालमेल और आपसी बातचीत और भाजपा-जदयू के गठबंधन में बिहार में अपना परचम लहराएंगे। इसी बीच उन्होंने कहा कि गुजरात में गोधरा कांड के बावजूद भाजपा की जीत हिंदू-मुस्लिम के भेद को मिटाकर जनसेवक की भावना से ही संभव हो पाई थी।
--जयपुर में ही ज्योतिष सलाह लेने का विचार कैसे आया?
--राजनीतिक सलाहकारों व न्यूज के माध्यम से यहां के ज्योतिष बारे में बहुत सुना था। यही लालसा मुझे यहां पं.गौड़ का आशीर्वाद लेने के लिए खींच लाई।

बुधवार, 11 अगस्त 2010

पारंपरिक पर्व तीज आज

महिलाएं और युवतियां तीज माता से करेंगी अखंड सौभाग्य की कामना,सिंजारे का रहा बेसब्री से इंतजार
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पारंपरिक पर्व तीज गुरुवार को हर्षोल्लास से मनाया जाएगा। इस इस मौके पर चारों ओर तीज के पद गूंज उठेंगे।
महिलाएं और युवतियां लहरिया पहनकर व सोलह शृंगार कर ताल-तलैया के पास तीज माता का पूजन करेंगी। तीज माता से अखंड सौभाग्य की कामना करेंगी। तीज से पहले बुधवार को सिंजारा मनाया गया। इस दौरान घर—-घर में घेवरों और मेहंदी की महक छाई रही। बाजारों में घेवरों और लहरिया खरीदने वालों की भीड़ रही। नवविवाहित युवतियों के लिए और सगाई का पहला सिंजारा ससुराल पक्ष की ओर से भेजा गया। इसमें सुहाग सामग्र्री के साथ घेवर आदि मिठाईयां भेजी गई। इस दौरान नवविवाहित घरों में सिंजारे का बेसब्री से इंतजार रहा। महिलाओं और कन्याओं ने मेहंदी रचाई।
ठाठ-बाट से निकलेगी तीज माता की सवारी
पर्यटन विभाग की ओर से जनानी ड्ïयोढ़ी से पारंपरिक तीज की सवारी निकाली जाएगी। सवारी शाही लवाजमे के साथ शाम 6 बजे रवाना होगी। लवाजमे में हाथी,घोड़े, ऊंट के साथ में कच्छी घोड़ी, अलगोजा, बहरूपिया, कालबेलिया, चकरी और बूंदी के बैल अपनी प्रस्तुति देंगे। इस दौरान लोकनर्तक व अन्य कलाकार सांस्कृतिक कार्यक्रमों की प्रस्तुति देंगे। सवारी विभिन्न मार्र्गों से होकर चौगान स्टेडियम पहुंचकर विसर्जित होगी। इस मौके पर त्रिपोलिया गेट पर हिंद होटल पर दर्शकों व विदेशी पर्यटकों के लिए विशेष व्यवस्था की जाएगी। शुक्रवार को बूढ़ी तीज की सवारी निकाली जाएगी।

हो गया दीदारे चांद, रमजान का पाक माह शुरू


मस्जिदों में तरावी में सुनाया कुराने पाक ....सहरी से इफ्तार तक चलेगा इबादत का दौर
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रमजान का पावन महीना गुरुवार से शुरू होगा। इस दौरान रोजेदार एक माह तक रोजे रखेंगे व मस्जिदों में जाकर इबादत करेंगे।
जौहरी बाजार की जामा मस्जिद में बुधवार को चीफ काजी खालिद उस्मानी की अध्यक्षता में सेंट्रल हिलाल कमेटी की बैठक हुई। चीफ काजी खालिद उस्मानी ने बताया कि जयपुर के आसपास, अजमेर के ऊंटडा व झालरापाटन सहित अनेक क्षेत्रों से चांद दिखाई देने की जानकारी के आधार पर कमेटी ने गुरुवार से रमजान शुरू होने की घोषणा की। इस मौके पर शहर मुफ्ती अहमद हसन, मुफ्ती अमजद अली, मुफ्ति मोहम्मद जाकिर व इजहार अहमद यजदानी उपस्थित थे।
बुधवार को मस्जिदों में कुराने पाक तरावी में सुनाया गया। बड़ी संख्या में अकीदतमंदों ने मस्जिदों में जाकर नमाज अदा की। यह सिलसिला 27 दिन तक जारी रहेगा। रमजान के पाक महीने में रोजेदार प्रतिदिन सुबह से लेकर सूर्यास्त तक खाना पीना छोड़कर इबादत करेंगे। अकीदतमंद सदाचार से अपना समय बिताएंगे। रोजेदार सूर्योदय से एक घंटे पहले सहरी करेंगे। पूरे दिन कार्यों के साथ इबादत करेंगे और शाम को सूर्यास्त के बाद रोजा इफ्तार करेंगे।
जामा मस्जिद के सचिव अनवर शाह ने बताया कि मस्जिद में जिला प्रशासन नगर निगम, पीएचईडी, फायर व अन्य सभी विभागों की ओर से विशेष इंतजाम किए गए हैं। अकीदतमंदों की सुविधा के सभी इंतजाम रहेंगे।

शुक्रवार, 6 अगस्त 2010

सावन में संयोगों की भरमार

सावन माह में इस बार संयोगों की भरमार रहेगी। ज्योतिषविदों के मुताबिक वर्षों बाद तीन वारों का उनके महत्व के अनुसार संयोग भी बन रहा है।
इन संयोगों में मंगल, शनि व सोम को सावन के प्रमुख पर्व, व्रत व ग्रहों का परिवर्तन होगा। इनमें सावन के दोनों प्रदोष व्रत शनिवार को आ रहे हैं। राजस्थान ज्योतिष परिषद के महासचिव डॉ. विनोद शास्त्री व ज्योतिषी पं. चंद्रमोहन दाधीच के अनुसार पौराणिक मान्यतानुसार शनिवार को प्रदोष का आना विशेष महत्व वाला माना गया है। इसी शृंखला में जहां सोमवार 16 अगस्त में शिव की आराधना होगी, वहीं सावन में अधिष्ठाता सूर्यदेव का सोमवार को सूर्य संक्रमण होगा। इस दिन सूर्यदेव स्वयं की ही राशि सिंह में प्रवेश करेंगे। सूर्य का एक राशि से दूसरी राशि में परिवर्तन सूर्य संक्रमण कहलाता है। ज्योतिषी दिनेश मिश्रा ने बताया कि 10 अगस्त मंगलवार को देवपितृकार्य अमावस्या अर्थात हरियाली अमावस्या होगी। वहीं 24 अगस्त को मंगलवार के ही दिन रक्षाबंधन का भी विशेष संयोग बनेगा। रामभक्त हनुमान के वार पर रक्षाबंधन से रक्षासूत्र का बंधन अटूट माना जाता है। वहीं हरियाली अमावस्या पर अखंड सौभाग्य की कामना का सुफल मिलेगा। सावन के विभिन्न संयोगों की शृंखला में ही इससे पहले मंगलवार को ही सावन का शुभारंभ हुआ। वहीं शनिवार को ही नागपंचमी का पर्व मनाया गया।

मंगलवार, 27 जुलाई 2010

सावन में फहरेगा एकता का परचम

सावन इस बार एकता का परचम फहरेगा। भगवान शिव की आराधना के इस पावन महीने में सभी धर्मों के धर्मावलंबी सांप्रदायिक सौहाद्र्र की बयार बहाएंगे।
सावन के पहले दिन जहां सावन की शुरुआत पर शिवमंदिरों में बम भोले के गुणगान से गूंज उठे। शिवमंदिरों में सहस्राभिषेक, रुद्राभिषेक का दौर शुरू हुआ। वहीं शाबान की पंद्रहवीं रात शब-ए-बारात के रूप में मनाई गई। मान्यतानुसार ईश्वर मानव के आगामी वर्ष का भाग्य तय करते हैं। मुस्लिम अनुयायियों ने गुनाहों का प्रायश्चित किया और इबादत में समय गुजारा। दूसरे दिन रोजा रखेंगे। इसी माह रमजान शुरू होंगे। केरल के प्रमुख पर्व ओणम, पारसी नववर्ष भी इस माह से शुरू हो जाएंगे। इसी बीच 22 वें तीर्थंकर भगवान नेमीनाथ का जन्म व तप कल्याणक और मोक्षसप्तमी पर 23 वें तीर्थंकर भगवान पाश्र्वनाथ का मोक्ष कल्याणक मनाया जाएगा।
सावन माह के इस अनूठे संगम में चार माह चलने वाले चातुर्मास का दौर भी शुरू हो जाएगा। इसमें हिंदू संत-महंतों के चातुर्मास प्रवेश के साथ ही जैन आचार्य-मुनियों का चातुर्मास होगा। चातुर्मास में संत महात्मों का प्रवचन से लोग लाभान्वित रहेंगे।
हिंदू व मुस्लिम त्योहार 32 से 35 वर्ष में साथ—साथ....
ज्योतिष गणना के अनुसार हिंदू त्योहार चंद्र वर्ष व सौर वर्ष के अनुपात के बराबर करते हुए मनाए जाते हैं। पंडित बंशीधर जयपुर पंचांग निर्माता पंडित दामोदर प्रसाद शर्मा के अनुसार मुस्लिम त्योहार चंद्रवर्ष के अनुसार ही मनाए जाते हैं। चंद्रवर्ष 354 दिन का होता है। प्रतिवर्ष 11 दिन के अंतर के कारण दोनों के त्यौहार 32 से 35 साल में साथ—साथ आ जाते हैं। जामा मस्जिद के सचिव अनवर शाह बताते हैं कि एक साथ आने वाले मुस्लिम त्योहारों में सभी के मानवमात्र के कल्याण का संकल्प लेना चाहिए।
यूं होगा सावन में संस्कृतियों का मिलन....
27 जुलाई : सावन व शब-ए-बारात, 12 अगस्त : रमजान, 15 अगस्त : भगवान नेमीनाथ का जन्म व तप कल्याणक , 16 अगस्त : मोक्षसप्तमी , 19 अगस्त : पारसी नववर्ष, 23 अगस्त : ओणम।

झूमती फिजाओं और महकती हवाओं ने चढ़ाए शिव को श्रद्धा के फूल


घंटे व घडिय़ालों से गूंजे शिवालय
सावन की फुहारों के साथ ही मंगलवार को शिव के सावन का आगाज हो गया। झूमती फिजाओं और महकती हवाओं ने सुबह शिव मंदिरों में श्रद्धा के फूल चढ़ाए।
यूं तो आषाढ़ की पूर्णिमा से ही मंदिरों में सावन की पूजा-अर्चना का दौर शुरू हो गया था। मगर मंगलवार से शुरू हुए श्रावण के पहले दिन शहर के मंदिर बम भोले और ओम नम: शिवाय के जयकारों से गूंज उठे। इसके साथ ही कई मंदिरों में सहस्रघटाभिषेक, रुद्राभिषेक व जलाभिषेक का दौर भी शुरू हुआ। साथ ही मंदिर शिव चालीसा, रुद्रपाठ, शिव महिमा और शिव स्त्रोत के साथ ही वैदिक मंत्रों की ऋचाओं से गूंज रहे थे।
दूसरी ओर, कावडिय़ों ने गलता तीर्थ से गालव गंगा का पवित्र जल लाकर शिव का अभिषेक किया। इस मौके पर शहर के प्रमुख मंदिर ताड़केश्वर महादेव मंदिर, क्विंस रोड स्थित झाडख़ंड महादेव मंदिर, बनीपार्क स्थित जंगलेश्वर महादेव मंदिर, झोटवाड़ा रोड स्थित चमत्मकारेश्वर महादेव मंदिर, धूलेश्वर गार्डन स्थित धूलेश्वर बाग और कूकस स्थित सदाशिव ज्योतिर्लिंगेश्वर महादेव मंदिर सहित अन्य मंदिरों में भक्तों की भीड़ रही।

शुक्रवार, 16 जुलाई 2010

जो रस बरस रह्यो गोकुल में वह तीन लोक में नाय...


गोसेवा परिवार की ओर से जनता में गोसेवा जाग्रत करने व गोवंश की रक्षा के लिए तीन दिवसीय नानी बाई का मायरा
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तबले की थाप, मंजीरे की धुन और गौ मां की रक्षा की पुकार। भक्ति की अविरल धारा से सराबोर भक्तों से खचाखच भरा गोविंददेवजी का दरबार। यहां मानो हर कोई नंदलाल और गौ की भक्ति में लीन हो गया हो। मौका था श्रीगोधाम महातीर्थ आनंदवन, पथमेड़ा और गोसेवा परिवार की ओर से प्रदेश की जनता का गोसेवा के लिए जाग्रत करने के लिए और गोवंश की रक्षा के लिए शुक्रवार को शुरू हुए तीन दिवसीय नानी बाई के मायरे का।
गिनीज बुक में नाम दर्ज करा चुका गोविंददेवजी मंदिर का सत्संग भवन मेरो प्यारो नंदलाल किशोरी राधे, किशोरी राधे-किशोरी राधे...के भजनों के साथ भक्तों की तालियों की गडग़ड़ाहट से गूंज उठा। गौमाता मंदिर में बह्मपीठाधीश्वर नारायणदास महाराज, पथमेड़ा के दत्तशरणानंद महाराज, महंत अंजन कुमार गोस्वामी, गोधाम के संरक्षक ज्ञानानंद महाराज तथा शुकसंप्रदाचार्य अलबेली माधुरीशरण महाराज ने दीप प्रज्वलन किया। इसके बाद व्यास पूजा की।
कथा व्यास राधाकृष्ण महाराज ने कहा कि इस संसार में गोमाता की भक्ति ही परमात्मा के अवतरण का आधार है। अकाल पीडि़त लाखों निराश्रित गोमाता की सेवार्थ गोधाम पथमेड़ा द्वारा प्रेरित गोसेवा परिवार समिति जयपुर की ओर से आयोजित नानी बाई के मायरे की कथा के माध्यम से जयपुर के भक्त गो माता की सेवा कर पाएंगे।
उन्होंने कहा कि गो मां की सेवा तन-मन-धन से करनी चाहिए। धनवान व्यक्ति को रातभर नींद नहीं आती। यहां तक कि उसे अपने परिवारजनों पर भरोसा भी नहीं रहता। यदि वह धन गोसेवा में लग जाए तो उसका जीवन सफल हो जाए। नंदबाबा के पास गोधन था, इसीलिए वहां गोपाल आए। कथा के मध्य में जो रस बरस रह्यो गोकुल में वह तीन लोक में नाय...और ए भाई मैं तो भक्तां रो दास...की पंक्तियों पर भक्त झूम उठे। कथाव्यास राधा कृष्ण ने कहा कि कंस के पास खूब धन था, लेकिन उसे चैन नहीं था और दूसरी तरफ गाय देखने के लिए भगवान गोकुल आए। भगवान छप्पन भोग, चांदी का महल बनाने से नहीं आए। गाय रे बिना भगवान का मन नहीं लगे...। उन्होंने भगवद भक्ति स्वरूप भक्त नरसी की भावपूर्ण कथा सुनाई।

जो आत्मिक ज्ञान कराए वही है सद्गुरु : आचार्य किरीट


गुरुपूर्णिमा महोत्सव के तहत आचार्य किरीट भाई एक दिवसीय सत्संग प्रवचन
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गुरु पूर्णिमा महोत्सव के तहत एक दिवसीय सत्संग प्रवचनों में शुक्रवार को आचार्य किरीट भाई ने कहा कि गुरु अपनी कटाक्ष दृष्टि से शिष्य का उद्धार करता है।
आचार्य ने कहा कि जीवन में गुरु हर कोई हो सकता है माता-पिता, भाई-बहिन। जो व्यवहारिक जीवन का ज्ञान दे वहीं गुरु होता है। इस दौरान भजन गायक जगदीश के निर्देशन में कलाकारों ने मेरे सद्गुरु हैं रंगरेज, चुनरिया मेरी रंग दीनी...भजन से साधकों को भक्तिरस से सराबोर कर दिया। इस मौके पर किरीट भाई ने रंगरेज का अर्थ समझाते हुए कहा कि दुनिया के सभी रंग लाल, नीले और पीले रंग से बनते हैं। उन्होंने कहा कि गुरु वह है जो आत्मा का ज्ञान कराए और ईश्वर प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करे। जीवन के अंधकार और भय को हटाकर ज्ञान को बढ़ावा दे। शंका समाधान में एक शिष्य द्वारा पूछे गए प्रश्र के जबाव में उन्होंने कहा कि भक्ति मंत्र का कोई मूल्य नहीं है। भगवान बिना भक्ति के किसी के पास नहीं आते। महेात्सव में आचार्य ने भक्तों को लक्ष्मी यंत्र भेंट किए गए। इस मौके पर उन्होंने लक्ष्मीजी की कथा सुनाई और लक्ष्मी यंत्र का महत्व समझाया। अंत में लड्डू गोपालजी की पूजा की गई। इसके बाद बड़ी संख्या में भक्तों ने पादुका पूजन किया।

सोमवार, 12 जुलाई 2010

जीवन के परम लक्ष्य का एक ही मार्ग, गुरुमंत्र


गुरु पूर्णिमा महोत्सव के तहत संत आसाराम बापू की मंत्र दीक्षा............
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शहर में प्रात:काल की वेला में रविवार को चल रही मधुर सुगंधित शीतल बयार के आगाज के साथ ही भारत की वैदिक संस्कृति का दृश्य साकार हो उठा। मौका था गुरु पूर्णिमा महोत्सव के तहत अमरूदों के बाग में योग वेदांत समिति की ओर से आयोजित तीन दिवसीय सत्संग के अंतिम दिन संत आसाराम बापू की मंत्र दीक्षा का।

हजारों साधक-साधिकाओं ने एक साथ बैठकर मंत्र जाप किया, तो पूरा वातावरण गुरु भक्ति की परंपरा के इस अनुपम सागर में रम गया। संत आसाराम बापू ने विद्या के लिए सारस्वत मंत्र की दीक्षा दी। इसके साथ ही मंत्रों का महत्व बताया। बापू ने कहा कि मंत्रों में सुसुप्त शक्तियों को जाग्रत करने की विलक्षण क्षमता होती है। यंत्र से मंत्र अधिक प्रभावशाली होता है। ओमकार पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि ओमकार भगवान का स्वाभाविक नाम है। शांत बैठकर ओमकार का गुंजन करने से भगवान विश्रांति प्राप्त होती है।

ओ और न के बीच का स्थान परमात्मा का है। सद्गुरु द्वारा बताए गए मार्ग पर चलकर श्रद्धा, तत्परता और इंद्रिय संयम के साथ साधना से मनुष्य अपने जीवन के परम लक्ष्य को प्राप्त कर लेता है। वास्तव में मनुष्य जीवन परमात्मा प्राप्ति के लिए है। सद्गुरु द्वारा बताए गए मार्ग से जितना लाभ होता है, उतना मनमानी साधना से नहीं होता।

सामाजिक जीवन में सफलता के लिए उन्होंने आपसी स्नेह की सलाह दी। उन्होंने कहा कि मनुष्य को निंदा, ईष्र्या और द्वेष से बचना चाहिए। आरंभ में बापू के शिष्य सुरेशानंद ने मंत्र जाप विधि व लाभ बताए। इसके बाद बापू हवाई मार्ग से कोलकाता के लिए रवाना हुए। समिति के संरक्षक बाबूलाल गुप्ता ने बताया कि मुख्य कार्यक्रम २५ जुलाई को गुरु पूर्णिमा पर सुबह दिल्ली और शाम को अहमदाबाद में होगा। प्रवक्ता तुलसी संगतानी ने कार्यक्रम की सफलता के लिए जिला प्रशासन व जनता का आभार जताया।

सोमवार, 17 मई 2010

सत्तर साल में चौदह बार बना तेरह दिन का पक्ष


आगामी तीस सालों में दो बार, पचास वर्ष बाद कल से शुरू होगा वैशाख शुक्लपक्ष में तेरह दिन का पक्ष
पचास वर्ष बाद वैशाख के शुक्लपक्ष से शुक्रवार को तेरह दिन का पक्ष शुरू होगा। ज्योतिषविदों की माने तो तेरह दिन के पक्ष का यह विशेष संयोग सत्तर वर्षों में चौदह बार बना, वहीं आगामी तीस वर्षों में यह केवर दो बार ही बनेगा।
यूं तो इस पक्ष में विवाह आदि शुभ कार्य संपन्न नहीं किए जा सकते। मगर इस बार द्वितीय वैशाख के शुक्लपक्ष में प्रतिपदा व चतुर्दशी तिथि क्षय होने के कारण बनने वाले 13 दिन के पक्ष से मांगलिक कार्य शुरू होंगे। पं.बंशीधर जयपुर पं.निर्माता पं.दामोदर प्रसाद शर्मा के अनुसार माना जाता है कि 13 दिवसीय पक्ष का संयोग सर्वप्रथम महाभारत काल में बना था। पंचाग निर्माताओं की मानें तो अधिकमास के बाद वैशाख शुक्लपक्ष में तेरह दिन का पक्ष संभवतया अब तक का पहला संयोग है।
सत्तर वर्ष पहले और तीस वर्ष बाद
पं. दामोदरप्रसाद शर्मा व पं.शक्तिमोहन श्रीमाली के अनुसार ज्योतिष आकलन में इससे पहले 1948 में वैशाख शुक्लपक्ष में 13 दिन का पक्ष था, लेकिन तब अधिक मास नहीं था। तेरह दिन का पक्ष ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष 1940, श्रावण शुक्लपक्ष 1945, वैशाख शुक्लपक्ष 1948, आश्विन शुक्लपक्ष 1951, भाद्रपद शुक्लपक्ष 1959, आषाढ़ कृष्णपक्ष 1962, कार्तिक कृष्णपक्ष 1974, श्रावण शुक्लपक्ष 1976, ज्येष्ठ कृष्णपक्ष 1979, द्वितिय आश्विन कृष्ण पक्ष 1982, आश्विन कृष्णपक्ष 1990, आषाढ़ शुक्लपक्ष 1993, कार्तिक शुक्लपक्ष 2005 और श्रावण कृष्णपक्ष 2007 में भी बना था। आगामी तीस वर्षों में यह वर्ष 2010 के बाद भाद्रपद शुक्लपक्ष 2021, आषाढ़ कृष्णपक्ष 2024 में बनेगा।
यूं बना तेरह दिन का पक्ष
ज्योतिषाचार्य दामोदर प्रसाद शर्मा के अनुसार तिथि का निर्माण चंद्रमा और सूर्य के अंतर से होता है। चंद्रमा की गति यदि तेज होती है और तिथियों के मान को जल्दी पार करता है तो तिथि का क्षय हो जाता है। पूरे पखवाडे में यदि चंद्रमा की गति 800 घटी- 13 अंश 20 कला या इससे अधिक रहती है तो उस पखवाड़ें में दो तिथियों का क्षय हो जाता है।

इस कारण संपन्न होगे विवाहादि मागलिक कार्य :
ज्योतिषविदों के मुताबिक केंद्र में शुभ ग्रहों की स्थिति वाले लग्र में यह दोष समाप्त हो जाता है। ज्योतिषी चंद्रमोहन दाधीच व पं.पुरुषोत्तम गौड़ के अनुसार इस वर्ष अधिकांश पंचागों में पीयूषधारा के वाक्य को ध्यान में रखते हुए द्वितीय वैशाख शुक्ल में 13 दिन के पक्ष में विवाह आदि मागलिक कार्यों के मुहूर्तों का उगेख किया गया है, पंचाग दर्पण के मतानुसार अत्यंत आवश्यक स्थिति में ही इन्हें स्वीकार करें।

गुरुवार, 15 अप्रैल 2010

पुरुषोत्तम मास के बाद वैशाख शुक्लपक्ष में पहली बार तेरह दिन का पक्ष

इस बार पुरुषोत्तम मास के बाद द्वितीय वैशाख के शुक्लपक्ष में 13 दिवसीय पक्ष का पहली बार दुर्लभ संयोगबनेगाा। इससे पहले यह संयोग 1948 में बना था, लेकिन तब अधिक मास नहीं था। यूं तो इस पक्ष में विवाह आदि कार्य वर्जित माने जाते हैं मगर विवाह लग्र के केंद्र में शुभ ग्रहों की दृष्टि वाले जातकों के शुभ कार्य संपन्न हो सकेंगे। माना जाता है कि 13 दिवसीय पक्ष का संयोग सर्वप्रथम महाभारत काल में बना था।
पंचांगनिर्माताओं की मानें तो अधिकमास के बाद वैशाख शुक्लपक्ष में तेरह दिन का पक्ष संभवतया अब तक का पहला संयोगहै। पुरुषोत्तमास में व्रत व दान-पुण्य से विशेष फल की प्राप्ति होती है। ज्योतिषी चंद्रमोहन दाधीच के अनुसार इस बार द्वितीय वैशाख के शुक्लपक्ष में प्रतिपदा व चतुर्दशी तिथि क्षय होने के कारण बनने वाले 13 दिन के पक्ष से मांगलिक कार्य शुरू होंगे।
पंचांगनिर्माता कहते हैं
पं.बंशीधर जयपुर पंचांगनिर्माता पं.दामोदर प्रसाद शर्मा के अनुसार हालांकि शास्त्रों में 13 दिवसीय पक्ष अशुद्ध माना गया है। लेकिन पंचांगमें यह मत भी दिया गया है अधिक आवश्यक होने पर विवाह करने वाले जातकों के लग्न के केंद्र में शुभ ग्रहों की दृष्टि हो तो यह संभव हो सकते हैं। पंचांगदर्पण के सह-संपादक पं. शक्तिमोहन श्रीमाली के अनुसार केंद्र में शुभ ग्रहों की स्थिति वाले लग्र में यह दोष समाप्त हो जाता है। इस वर्ष अधिकांश पंचांगों में पीयूषधारा के वाक्य को ध्यान में रखते हुए द्वितीय वैशाख शुक्ल में 13 दिन के पक्ष में विवाह आदि मांगलिक कार्यों के मुहूर्त लगाए गए हैं, पंचांगदर्पण के मतानुसार अत्यंत आवश्यक स्थिति में ही इन्हें स्वीकार करना चाहिए।
पहले कब बना था यह योग
पं. दामोदरप्रसाद शर्मा ने बताया कि ज्योतिष आकलन के अनुसार इससे पहले 1948 में वैशाख शुक्लपक्ष में 13 दिन का पक्ष था, लेकिन तब अधिक मास नहीं था। सामान्य तौर पर 13 दिन का पक्ष 1993 में आषाढ़ शुक्ल पक्ष, वर्ष 2005 में कार्तिक शुक्ल पक्ष और 2007 में सावन कृष्ण पक्ष में भी बना था।

बुधवार, 10 मार्च 2010

शील की डूंगरी में शहरी व ग्रामीण परिवेश का संगम

श्रद्धावत भक्तों ने लगाई हाजिरी,शीतला माता के लगा शीतल व्यंजनों का भोग, सोलह दिवसीय गणगौर पूजा के तहत बच्चों ने रचाया दूल्हा दुल्हन का स्वांग, बाग बगीचों रही रौनक
प्रत्येक धर्म और संस्कृति को संजोए धार्मिक नगरी जयपुर के लिए सोमवार का दिन विशेष रहा। शीतलाष्टमी के पावन पर्व पर घर-घर में शीतल व्यंजनों से शीतला माता की आराधना के साथ ही शहर से करीब 35 किलोमीटर दूर चाकसू स्थित शील की डूंगरी में परंपरागत मेला भरा।
शहरी और ग्रामीण परिवेश की फिजां में मानो हरेक समाज घुल-मिल गया हो। हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी शील की डूंगरी का मेला परवान पर रहा। न कोई अमीर, न कोई गरीब हरेक में मातेश्वरी शीतला माता के दर्शनों की आस्था सर चढ़कर बोल रही थी। हाथों में श्रद्धा के फूल लिए हजारों भक्तों ने करीब तीन सौ मीटर दूरी तक सीढियां चढ़कर माता के दरबार में हाजिरी दी। पूरा वातावरण शीतला माता के जयकारों से गूंज रहा था। अन्य दिनों में वीरान सी नजर आने वाली शील की डूंगरी का आसपास का करीब पांच किलोमीटर का दायरा हर वर्ग के लोगों की खुशियां बटोर रहा था। माता की आस्था के साथ मेले की रौनक अष्टमी के इस पर्व में चार चांद लगा रही थी। दो दिवसीय इस मेले में रविवार देर रात से ही माता के दर्शनों की लंबी कतारे लगना शुरू हो गई थी, जो सोमवार दोपहर तक रही।
धान का दान, मांगी मन्नते : आरोग्य और सुख की कामना से दूर दूर से आए भक्तों ने माता के समक्ष धान का दान किया और मन्नतें मांगी। इनमें गेहूं, जौ व बाजरे का दान किया। वहीं माता को नारियल, चुनरी भेंट की और मालपुए का भोग लगाया।
घूंघट में झांकती संस्कृति : शहरी परिवेश के अलावा यहां संस्कृति का हर रंग नजर आ रहा था। घूंघट से झांकती ट्रेक्टर, ऊंट गाड़ी व घोड़ा गाड़ी में बैठी महिलाएं इस परंपरागत मेले का आनंद उठाती नजर आ रही थीं।
गाडोल्या से रिमोट कार तक : मेले में पुराने समय मे चलने वाली गाडोल्या भी यहां नजर आ रही थीं, तो वहीं रिमोट कार का भी थी। इसके साथ ही मेले में दस मिनट तक चलने वाला मौत के कुए का तमाशा और करीब सत्तर फीट ऊंचे झूलों का आनंद भी कुछ कम नहीं था। हर वर्ग की पसंद का नजारा यहां था।
इतिहास के पन्नों में : प्राचीन किवदंतियों में शील की डूंगरी का यह मंदिर करीब पांच सौ वर्ष पुराना है। पुजारी लक्ष्मण प्रजापति बताते हैं कि इस मंदिर से जुड़ी कई किवदंतियां हैं। लेकिन माता के दरबार में आने वाला कोई भी पीढि़त व्यक्ति खाली हाथ नहीं जाता। उन्होंने बताया कि हालांकि पहले की तुलना में श्रद्धालुओं में कुछ कमी आई है लेकिन इस बार पिछले वर्ष की तुलना में भक्त अधिक हैं। बस्सी के राम खिलाड़ी ने बताया कि वह कई वर्ष से यहां माता के दर्शनो के लिए आ रहे हैं और उनकी पूरी कृपा है। प्रत्येक वर्ष शहर के अलावा आसपास के गांवो के अलावा प्रदेशभर के हजारों भक्त यहां दर्शनों के लिए आते हैं।

प्रयत्न से ही संभव हैसमाज में जागरूकता : अम्मा

जयपुर शहर में अमृत वर्षा का संचार करने के लिए आई माता अमृतानंदमयी अम्मा ने कहा है कि रत्न के गंदगी में गिर जाने से कभी रत्न की चमक कमजोर नहीं पड़ती। तब भी ज्ञानी पुरुष उसे ढूंढ ही लेते हैं। अम्मा से हुई बिशेष बातचीत के कुछ अंश :
-वर्तमान में धर्म की भूमिका कितनी कारगर है?
-देश में प्राचीन काल से ही शंकराचार्य व रामानुज संप्रदाय पूजनीय रहे हैं जो वर्तमान में भी वही स्थिति रखते हैं। धर्म के नाम पर कुछ लोगों ने पाखंड फैला रखा है मगर इसकी पहचान समाज को ही करनी होगी। महापुरुषों की पहचान करनी चाहिए, तभी समाज की कुरीतियों का अंत होगा।
-धर्म के नाम पर पिछले दिनों कुछ संतों का नाम स्कैंडल में भी आया है?
-सभी ऐसे नहीं होते। जरूरी नहीं लाइब्रेरी में एक दो किताबों को छोड़कर सभी किताबें ज्ञान आधारित होती हैं। हॉस्पीटल में एक डॉक्टर नालायक निकले तो जरूरी नहीं, सभी ऐसे ही हों"े। इसके लिए समाज में जागरूकता की आवश्यकता है। वह कार्य भी हमें ही करना होगा।
-समाज में जागरूकता के लिए क्या होना चाहिए?
-प्रयत्न से ही यह संभव है। यह जरूरी नहीं प्रत्येक प्रयत्न सफल हो। मगर प्रयत्न से समाज को बदला जा सकता है। डीजीपी ने भी समाज में क्रिमिनल्स के उत्थान की बात कही थी।
-क्या आप क्रिमिनल्स के उत्थान की कोई योजना शुरू करेंगी?
-हां लेकिन इलाहबाद में बेघरों के उत्थान की योजना पूर्ण होने के बाद इस पर कार्य किया जाएगा। कोशिश करेंगे, कि इसकी शुरुआत जयपुर से हो।
-देश विदेश में अम्मा के मठ हैं, क्या राजधानी में भी वह अपना मठ स्थापित करेंगी?
-मेरा पहला उद्देश्य सभी की इच्छाएं पूर्ण करना है। पहले सेवा कार्य आरंभ हों और समाज का भला हो। फिर मठ स्थापना की बात हागी। बेघरों को घर मिले। वहीं गरीबों के लिए सेल्फ एंप्लॉयमेंट स्कीम योजनाएं भी चलाई जा रही हैं।
-अम्मा ने यूएनए में स्प्रिच्यूअल लीडर्स की स्पीच में भगवान से वरदान में सर्वप्रथम स्वीपर बनने की इच्छा जाहिर की थी। क्या यह सही है?
-हां, क्योंकि स्वीपर पूरे समाज की गंदगी साफ करता है।
-जयपुर के लिए अम्मा क्या देकर जाएंगी?
-आशीर्वाद के अलावा कुछ नहीं है मेरे पास। सभी सुखी रहे। यही कामना है।

बुधवार, 13 जनवरी 2010

दे माई दे माई लोहड़ी...

पंजाब में ऋतु परिवर्तन एवं नई फसल के यौवन पर आने की खुशी मेें मनाए जाने वाले पर्व लोहड़ी पर जयपुर में पंजाबी समाज के लोगों ने अनेक आयोजन किए, कलाकारों को बुलाया, रेवड़ी, मूंगफली और पॉपकॉर्न का प्रसाद बांटा।
पहली लोहड़ी पर नवविवाहित जोड़ों एवं नवजात शिशुओं वाले घरों में उत्सव का माहौल रहा। ऐसे घरों में कुंवारे लड़के-लड़कियों की टोलियां शगुन मांगने पहुंची। वहां पहुंचकर दे माई लोहड़ी वे, जीवे तेरी जोड़ी वे.. गाकर शगुन मागा। लोगों ने घरों और चौराहों पर डीजे लगाकर पंजाबी भंगडा और गिद्दा की धुनों पर नाचते-गाते लोहड़ी पर्व मनाया। लोहड़ी की अग्नि में लोगों ने समृद्धि एवं खुशहाली के लिए रेवड़ी, मूंगफली, मक्का के फूले तथा तिल से बनी मिठाइयां अर्पित की।

मंगलवार, 12 जनवरी 2010

मह•ेगी गंगा—जमुनी तहजीब

इस साल हिंदू, मुस्लिम व जैन धर्म •े •ई प्रमुख पर्व मनाए जाएंगे साथ—साथ, शुरुआत होली से
वर्ष 2010 गंगा—जमुनी तहजीब से दम• उठेगा। वर्षभर सभी धर्मों •े धर्मावलंबी सांप्रदायि• सौहाद्र्र •ी बयार बहाएंगे। मुस्लिम धर्मावलंबी चांद •े तीसरे महीने रवि—उल—अव्वल •ी बारह तारीख •ो बरावफात मनाएंगे, वहीं अगले दिन हिंदू लोग होली मनाएंगे। दूसरी ओर जैन धर्मावलंबी महावीर जयंती पर भगवान महावीर •ो याद •रेंगे तो इसी दिन सूफी संत हजरत गौस उल आजम शेख अब्दुल •ादिर जिलानी रहमतुल्लाह अलेह (11वीं शरीफ) •ी जयंती मनाई जाएगी।
सावन में शिवमंदिर भोलेनाथ •े गुणगान से गूंजेंगे, तो इसी माह रमजान शुरू होंगे। इसी माह में जन्माष्टमी और जुमातुलविदा भी है। इस•े बाद ईद उल फितर व गणेश चतुर्थी साथ—साथ हैं। वहीं नवंबर में ईद—उल—अजहा पर देवउठनी ए•ादशी है। इसी माह दीपावली भी है। दिसंबर में योम—ए—आसुरा •े पर्व •े साथ ईसाई पर्व •्रिसमस धूमधाम से मनाया जाएगा।
हिंदू व मुस्लिम त्यौहार 32 से 35 वर्ष में साथ—साथ
ज्योतिष गणना •े अनुसार हिंदू त्यौहार चंद्रवर्ष व सौर वर्ष •े अनुपात •ो बराबर •रते हुए मनाए जाते हैं। पंडित बंशीधर जयपुर पंचांग निर्माता पंडित दामोदर प्रसाद शर्मा •े अनुसार दूसरी ओर मुस्लिम त्यौहार सिर्फ चंद्रवर्ष •े अनुसार ही मनाए जाते हैं। सौर वर्ष 365 दिन •ा होता है, वहीं चंद्रवर्ष 354 दिन •ा होता है। प्रतिवर्ष 11 दिन •े अंतर •े •ारण दोनों •े त्यौहार 32 से 35 साल में साथ—साथ आ जाते हैं। जामा मस्जिद •े सचिव अनवर शाह बताते हैं •ि ए• साथ आने वाले मुस्लिम त्यौहारों में सभी •ो मानवमात्र •े •ल्याण •ा सं•ल्प लेना चाहिए। गलत बातों •ो भूल•र धर्म •ी ओर अग्रसर हों।
ये पर्व साथ—साथ
-———27 फरवरी : बारावफात, 28 फरवरी : होलि•ा दहन।
———28 मार्च : 11वीं शरीफ व महावीर जयंती।
———27 जुलाई : सावन •ा आगाज तो 12 अगस्त : रमजान शुरू, 1 सितंबर : जन्माष्टमी, शहादते हजरत अली, 10 सितंबर : जुमातुलविदा।
———11 सितंबर : ईद—उल—फितर, गणेश चतुर्थी
———17 सितंबर : तेजाजी •ा मेला, सुगंध धूप दशमी
———17 नवंबर : देवउठनी ए•ादशी व ईद—उल—अजहा। इसी माह दीपावली भी मनाई जाएगी।